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Tuesday, 28 April 2020

दोस्तों नमस्कार ! मैं हूँ संतोष और आप सभी का स्वागत है शिक्षा विचार हिंदी एजुकेशनल ब्लॉग में। इस लेख में हम बात करने वाले है: Gender And Its Cross Cultural Perspective । Concepts of Sex and Gender  अर्थात जेंडर एवं इससे सम्बन्धित पार सांस्कृतिक परिक्षेप्य और सेक्स तथा जेंडर की अवधारणा के ऊपर। 
जेंडर एवं इससे सम्बंधित सांस्कृतिक परिक्षेप्य Gender And Its Cross Cultural Perspective । Concepts of Sex and Gender
जेंडर एवं इससे सम्बंधित सांस्कृतिक परिक्षेप्य Gender And Its Cross Cultural Perspective । Concepts of Sex and Gender 

जेंडर एवं इससे सम्बंधित पार सांस्कृतिक परिक्षेप्य (Gender And Its Cross Cultural Perspective) 

भारतीय सन्दर्भ में जेंडर पर काफी विमर्श का दौर है, जिसमें कमला भसीन, उमा चक्रवर्ती, मैत्रेयी कृष्णराज, शर्मीला रेगे और निवेदिता मेनन का नाम प्रमुख रुप से सामने आता है।

कमला भसीन कहती हैं, " जेंडर सामाजिक संस्कृति के रूप में स्त्री-पुरुष की दी गयी परिभाषा है, जिसके माध्यम से समाज उन्हें स्त्री और पुरुष दोनों की सामाजिक भूमिका में विभजित करती  है। यह समाज की सच्चाई को मापने का एक विश्लेषणात्मक औजार है। "

मैत्रेयी कृष्णराज के अनुसार, " समाज में जितनी भी आर्थिक व राजनैतिक समस्यांए हैं उनका सम्बन्ध जेंडर से है। जेंडर लिंग आधारित श्रम का विभाजन है जिसे पितृसत्ता ने सामाजिक अनुशासनों द्वारा तय किया है। जिसकी कल्पना को परिवार और आर्थिक आधार पर खोजना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त जेंडर एक विश्लेषणात्मक श्रेणी है जो सामाजिक संरचना व उसके जटिल व्यवहार मूलक संबंधों को स्त्री पुरुष के बीच के संबंधों से जानने का प्रयास करता है।"

शर्मीला रेगे, जेंडर को विचार की प्रक्रिया मानती हैं तथा इसको ऐसा वर्ग मानती हैं जिसमें कुछ सम्बन्धो को रखा जाये और उनसे निर्मित संबंधों को जाना जा सके।


उमा चक्रवर्ती भी सामजिक संरचना को स्त्री की निर्मिति का कारन मानती हैं-स्त्री का परिवेश, उसकी पराधीनता की प्रकृति को तय करता रहा है।

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  • इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में 'लिंग' और 'जेंडर' के अंतर को स्पष्ट करता विचार पहले से मौजूद रहा है। जेंडर शब्द की उत्पत्ति व उसके के प्रयोग के संदर्भ में अलग-अलग मतों को अब तक जाना व समझा गया है। विभिन्न भाषा वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, इतिहासकार, मनोवैज्ञानिक नृविज्ञानी, मानव शास्त्री, जीव वैज्ञानिक व नारी वादियों द्वारा जेंडर के संदर्भ में जो कहा गया उसे देखने व समझने का हमने प्रयास किया तथा उसके आधार पर जेंडर को परिभाषित करने की कोशिश की गई। 


  • जेंडर की अपनी कोई उचित परिभाषा नहीं है। किसी ने इसे भाषा के संदर्भ में देखा तो किसी ने सामाजिक संदर्भ में। इसके अतिरिक्त जेंडर को इतिहास ,संस्कृति, प्रकृति, सेक्स और सत्ता से भी जोड़कर देखने व समझने का प्रयास किया गया। स्त्री के संदर्भ में हमेशा से माना गया कि वह एक ऑब्जेक्ट है और फिर चाहे पाश्चात्य, अस्तित्ववादी दार्शनिक सोरेन की बातें हों, जिन्होंने, "जिन्होंने नारी को जटिल रहस्यमय सृष्टि" माना या "फिर नीत्शे हो जिसने माना कि "नारी पुरुष का सबसे पसंदीदा या कहें कि खतरनाक खेल है।" वही रूसो ने स्त्री की निर्मिती पुरुष को खुश रखना स्वीकारा। 



  • भारतीय संदर्भ में भी स्त्री को 'सेक्स ऑब्जेक्ट' के रूप में देखा व स्वीकारा गया जहां उसकी उपयोगिता पुरुष को खुश करने तक ही सीमित थी। महादेवी वर्मा ने लिखा है:- "स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण प्रतिष्ठा चाहती है, कारण वह जान गई है कि इसका अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना है तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाना  है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उसको देखते रहना है जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बांट लेंगे।


  • सामाजिक विकास की प्रक्रिया में सक्रिय प्रागैतिहासिककालीन, वैदिककालीन, ब्राह्मणकालीन, सामाजिक व्यवस्था से लेकर आज के समय तक भी हम स्त्री के परिक्षेप्य में बात करते हैं तो उसे पराधीन व सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में व्याख्या करते हैं या देवत्व के बोझ तले खुद के अस्तित्व को दम तोड़ते हुए देखते हैं।

सेक्स तथा जेंडर की अवधारणा
(Concepts of Sex and Gender) 


  • एक शिशु या तो पुरुष या स्त्री के रूप में पैदा होता है। हम किस प्रकार पुरुष या स्त्री में विभेद करते हैं? पहली बात जो दिमाग में आती है:- वह है नवजात शिशु का लिंग या या ऐसी जैविक विशेषता जो पुरुष या स्त्री में अंतर कर सके। इस प्रकार हम सेक्स को जैविक संदर्भ में परिभाषित कर सकते हैं तथा यह कह सकते हैं कि दोनों प्रकार के सेक्स में काफी जैविक अंतर पाए जाते हैं। इस प्रकार सेक्स एक द्विलिंगी तंत्र है जिसमें दो प्रकार के विकल्प (पुरुष तथा स्त्री) सामान्यतः मौजूद होते हैं।

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  • हम सभी के दिमाग में सेक्स का सामान्य रूप से यही चित्र रहता है तथा साथ ही इससे जुड़े स्त्री-पुरुष के अलग अलग व्यवहार इस तस्वीर को गहरे रहते हैं। यह तस्वीर हमारे जीवन के अनुभवों तथा पालन पोषण के तरीकों से और प्रगाढ़ होती रहती है तथा संस्कृति दर संस्कृति इसे संरक्षित सुरक्षित तथा स्थानांतरित करती रहती है। यह तस्वीर मनुष्य की मानसिकता में गहरे कहीं दबी रहती है जो जेंडर का रूप ले लेती है।


  • ये दो शब्द 'सेक्स' तथा 'जेंडर' के काफी हद तक सामान लगते हैं तथा मनुष्य के मूलभूत गुणों का वर्णन करते हुए लगते हैं तथा अधिकांशतः दोनों शब्दों को एक दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त भी कर लिया जाता है। कई लोग इन्हें समानार्थी भी समझते हैं। एक शिशु के जन्म लेते ही उसे या तो स्त्री या पुरुष कहा जाता है तथा यह शिशु के सेक्स को इंगित करता है। इस आधार पर 'सेक्स' स्त्री व पुरुष के मध्य जैविक अंतर को प्रकट करता है जबकि 'जेंडर' एक सामाजिक संदर्भ को प्रकट करता है। यह उन सभी विशेषताओं को प्रकट करता है जो एक समाज पुरुष व स्त्री के लिए उपयुक्त समझता है तथा इस प्रकार सेक्स स्त्री पुरुष को इंगित करता है वही जेंडर स्त्रीत्व हुआ पुरुषत्व को इंगित करता है।

  • सेक्स अनुवांशिकी के तरीके से निर्धारित होता है जबकि जेंडर प्रत्येक सेक्स के लिए उचित व्यवहारों एवं अभिवृत्तियों के  सामाजिकरण द्वारा सीखा जाता है। जेंडर एक ऐसा उपकरण है जिसके द्वारा समाज अपने सदस्यों को नियंत्रित करता है। जेंडर लोगों को विभिन्न जीवन अनुभवों के आधार पर स्त्री-पुरुष को अलग करता है तथा यही एक व्यक्ति के शक्ति सम्मान तथा संपत्ति के आधार पर ही उसकी पहुंच को सुनिश्चित करता है। इस प्रकार जेंडर का सेक्स से एकदम भिन्न अर्थ है क्योंकि यह एक व्यक्ति के जन्म के समय की जैविक एवं शारीरिक विशेषताओं से बिल्कुल संबंधित नहीं है बल्कि यह उन समाज निर्मित भूमिकाओं के बारे में बताता है जो एक ही स्त्री व पुरुष से निभाए जाने की अपेक्षा रखते हैं।

  • यह भूमिका विभिन्न संस्कृतियों के अनुसार बदलती रहती हैं। जेंडर को कभी भी पूरी तरह परिभाषित नहीं किया जा सकता। हालांकि समाज जरूर कुछ सामान्य गुणों को स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व की श्रेणी में रखता है। जेंडर के निर्माण में हम जो भी अपने अभिभावकों, संगी-साथियों एवं समाज से सीखते हैं वह महत्वपूर्ण होता है। यह एक ऐसी आंतरिक भावना है जो हम प्रदर्शित भी करते हैं। इस प्रकार ऐसी जैविक विशेषताएं जो स्त्री-पुरुष में विभाजन करती हैं वह सेक्स कहलाती हैं और ऐसी सामाजिक विशेषताएं जो एक समाज अपनी स्त्री व पुरुष के लिए उपयुक्त समझता है वह जेंडर कहलाती है।
  • जेंडर स्त्री व पुरुष की व्यवहारगत, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को प्रकट करता है। साथ ही यह स्त्री व पुरुष की भूमिका तथा उत्तरदायित्व की ओर इंगित करता है जिन्हें परिवार, समाज एवं संस्कृतियों के द्वारा निर्मित किया जाता है। यह स्त्रीत्व तथा पुरुषत्व के द्वारा अपेक्षित व्यवहारों एवं अभिवृत्तिओं को समाहित करता है। इसे समाज को बांधे रखने का एक मूलभूत नियम भी मान सकते हैं जो लोगों को सोचने समझने तथा एक दूसरे से अंतः क्रिया करने को भी निर्देशित करता है।

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