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Sunday, 18 April 2021

शिक्षा की आधुनिक धारणा को समझने के लिए हमें शिक्षा की आधुनिक तथा प्राचीन दोनों धारणाओं का तुलनात्मक अध्ययन करना पड़ेगा।अतः निम्नलिखित पंक्तियों में हम शिक्षा के विभिन्न अंगों पर तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करेंगे।

शिक्षा की आधुनिक धारणा (Shiksha Ki Adhunik Dharna), शिक्षा की प्राचीन अवधारणा, शिक्षा के प्रकार, प्राचीन और आधुनिक शिक्षा प्रणाली
शिक्षा की आधुनिक धारणा (Shiksha Ki Adhunik Dharna)


 इस लेख में निम्नलिखित बिंदुओं पर चर्चा की जाएगी


  • शिक्षा की आधुनिक अवधारणा
  • शिक्षा की प्राचीन अवधारणा
  • शिक्षा के प्रकार
  • शिक्षा और विकास
  • आधुनिक शिक्षा क्या है
  • प्राचीन और आधुनिक शिक्षा प्रणाली
  • शिक्षा का अर्थ एवं उद्देश्य
  • आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य
  • शिक्षा के उद्देश्य

१. शिक्षा का अर्थ ( Meaning of education)

शिक्षा शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के एडूकेटम शब्द से हुई है एडूकेटम का अर्थ है- शिक्षण के लिए कला। इस प्रकार शिक्षा की आधुनिक धारणा के अनुसार शिक्षा बालक के अंदर छिपी हुई समस्त शक्तियों को सामाजिक वातावरण में विकसित करने की कला है।


प्राचीन शिक्षा के अंतर्गत निर्देशन पर बल दिया जाता था। अतः शिक्षा का कार्य था - बालक के मस्तिष्क में पके पकाए ज्ञान को बलपूर्वक ठूंसना।


आजकल 'मस्तिष्क एक खाली बर्तन' तथा 'एक कोरी प्लेट' आदि प्राचीन धारणाओं का खंडन करते हुए इस बात पर बल देता है कि न तो मस्तिष्क एक खाली बर्तन के समान है जिसको भरने के लिए निर्देशन द्वारा ज्ञान को बाहर से भरना अथवा बलपूर्वक ठूंसना आवश्यक है तथा न ही एक कोरी प्लेट है जिस पर विषय वस्तु को अंकित किया जाए। 


अतः आधुनिक शिक्षा शिक्षण की उपेक्षा सीखने पर बल देती हुई मार्गदर्शन अभिवृद्धि तथा सामाजिक विकास के रूप में उपस्थित होती है।


२. शिक्षा के उद्देश्य (Aims of education)

प्राचीन शिक्षा बालक के मानसिक विकास पर बल देती थी जिसके अनुसार केवल ज्ञानार्जन को ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य माना जाता था। शिक्षा की आधुनिक धारणा के अनुसार शिक्षा शास्त्री व्यक्ति की प्रकृति का अध्ययन करते हुए मानसिक विकास के साथ-साथ उसके शारीरिक सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास पर भी बल देते हैं। 


इस प्रकार शिक्षा के आधुनिक धारणा के अनुसार, "बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास तथा उसमें सामाजिक कुशलता के गुणों का विकास करना ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है।


३. पाठक्रम ( Curriculum)

प्राचीन धारणा के अनुसार पाठ्यक्रम में केवल उन विषयों को ही सम्मिलित किया जाता था जिन के अध्ययन से बालक का मानसिक विकास किया जा सके। शिक्षा की आधुनिक धारणा के अनुसार बालक के सर्वांगीण विकास हेतु पाठ्यक्रम संबंधी तथा आगामी दोनों प्रकार की क्रियाओं एवं अनुभवों को सम्मिलित करके पाठ्यक्रम को लचीला तथा प्रगतिशील बनाने पर बल दिया जाता है जिससे प्रत्येक बालक अपनी अपनी अभिरुचियों तथा आवश्यकताओं के अनुसार विकसित होकर समाज की सेवा करता रहे। 


अतः कहा जा सकता है कि शिक्षा की आधुनिक धारणा पाठ्यक्रम के अंतर्गत ज्ञानार्जन संबंधी विषयों की अपेक्षा सामाजिक अध्ययन पर बल देता है।


४. शिक्षण पद्धतियां (methods of teaching)

शिक्षा की प्राचीन धारणा पाठ्यक्रम के सभी विषयों को कंठस्थ करने पर बल देती है। इस पर्यटन पद्धति के कारण शिक्षा निर्जीव तथा नीरस हो गई थी।



शिक्षा की आधुनिक धारणा के अनुसार अब बालक की सर्वांगीण विकास हेतु पर्यटन पद्धति की अपेक्षा खेल विधि करके सीखने की विधि तथा योजना आदि शिक्षण पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है जिससे प्रत्येक बालक अपने-अपने रुचियां तथा आवश्यकता के अनुसार वास्तविक जीवन के अनुभव प्राप्त करके स्वयं विकसित होता रहे।




५. अनुशासन ( Discipline)

प्राचीन धारणा के अनुसार अनुशासन के लिए कठोर दंड अथवा केवल डंडे को ही शिक्षक की सहायक सामग्री समझा जाता था। शिक्षा की आधुनिक धारणा के अनुसार अनुशासन हेतु दमन की अपेक्षा शिक्षक के प्रभाव तथा नियंत्रित स्वतंत्रता पर बल देती है जिससे बालक में आत्म अनुशासन की भावना विकसित हो सके।


६. परीक्षा ( Examination )

शिक्षकों बालक की शैक्षणिक प्रगति का पता लगाने के लिए परीक्षा का प्रयोग करना पड़ता है। अतः परीक्षा के संबंध में प्राचीन धारणा ने निबंधात्मक परीक्षाओं को जन्म दिया जिससे बालक की रिटर्न शक्ति का पता लग जाए। 


शिक्षा के आधुनिक धारणा के अनुसार वस्तुनिष्ठ परीक्षण, प्रगति पत्रों तथा वर्धनशील लिखित विवरण आदि के ऊपर बल दिया जाता है जिससे बालक की विभिन्न क्षेत्र में होने वाली प्रगति का ठीक-ठीक पता चल सके।


७. शिक्षा के साधन (agencies of education)

प्राचीन धारणा के अनुसार शिक्षा का उत्तरदायित्व केवल स्कूल पर ही समझा जाता था परंतु शिक्षा की आधुनिक धारणा के अनुसार यह उत्तरदायित्व स्कूल के साथ-साथ परिवार, समुदाय, धर्म तथा राज्य आदि सभी अनौपचारिक साधना पर समझा जाता है। अतः अब इस बात पर बल दिया जाता है कि सभी अनौपचारिक साधनों को स्कूल रूपी औपचारिक साधन के साथ पूर्ण सहयोग प्रदान करना चाहिए।


८. शिक्षक ( Teacher)

प्राचीन धारणा के अनुसार शिक्षा शिक्षक प्रधान थी। अतः शिक्षक का स्थान एक निर्देशक अथवा तानाशाह की भांति समझा जाता था । शिक्षा की आधुनिक धारणा के अनुसार शिक्षक एक मित्र दार्शनिक तथा पथ प्रदर्शक समझा जाता है। शिक्षा की आधुनिक धारणा के अनुसार शिक्षक से यह आशा की जाती है कि वह बालकों के साथ सहानुभूति पूर्ण तथा व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करके उनमें सामाजिक रुचियां आदतों तथा दृष्टिकोणों का विकास करे।


९. बालक (Child) 

प्राचीन धारणा के अनुसार बालक को निष्क्रिय श्रोता के रूप में एक ही आसन से बैठकर शिक्षक की अनुदेशन को सुनने की आदत डाली जाती थी। शिक्षा के आधुनिक धारणा के अनुसार शिक्षा बाल केंद्रित हो गई है। अतः अब इस बात पर बल दिया जाता है कि बालक को अधिक से अधिक सक्रिय रहकर पाठ के विकास में रुचि प्राप्त कराई जा सके तथा शिक्षक और बालकों के बीच अधिक से अधिक अंतर प्रक्रिया हो जिससे प्रत्येक बालक का अधिक से अधिक विकास हो।



१०. विद्यालय (School)

शिक्षा की प्राचीन धारणा के अनुसार स्कूल को ऐसी दुकान समझा जाता था जहां पर ज्ञान के विक्रेता बालकों को डंडे के बहन से विभिन्न विषयों को हटाते थे भले ही रटा हुआ ज्ञान उनके भावी जीवन में काम आए अथवा नहीं दूसरे शब्दों में कहा जाए तो प्राचीन धारणा के अनुसार इस बात को आवश्यक नहीं समझा जाता था कि शिक्षा में लगाई गई पूंजी अथवा आदा अनुपात से उत्पादन अथवा प्रदा भी हो



शिक्षा की आधुनिक धारणा के अनुसार स्कूल को समाज का लघु रूप माना जाता है साथ ही शिक्षा को एक उद्योग तथा शिक्षक को इस शिक्षा रूपी उद्योग का व्यवस्थापक समझा जाता है जो बालकों के लिए सीखने की व्यवस्था करता है और यह देखता है कि बालको की शिक्षा में लगाई गई पूंजी द्वारा योग्यता अथवा प्रदा बड़ी अथवा नहीं।



११. शिक्षा एक अनुशासन के रूप में (education as a discipline)

प्राचीन धारणा के अनुसार शिक्षा को एक प्रक्रिया तथा प्रशिक्षण के अर्थ में प्रयोग किया जाता था आधुनिक धारणा के अनुसार शिक्षा को एक प्रक्रिया तथा प्रशिक्षण के तरीके दूसरे विषयों की भांति अध्ययन का एक स्वतंत्र विषय अथवा अनुशासन माना जाता है।





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