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Wednesday, 25 May 2022

(1) धार्मिक शिक्षा

धार्मिक शिक्षा के अंतर्गत छात्र की कुरान की आयतें कंठस्थ करने के अतिरिक्त उनका सूक्ष्म एवं आलोचनात्मक अध्ययन करना पड़ता था छात्र को सूफी सिद्धांतों एवं इस्लामी इतिहास, कानूनों ,सिद्धांतों और परंपराओं का भी अध्ययन करना पड़ता था।


(2) विषय 

लौकिक शिक्षा छात्रों को इन विषयों की शिक्षा दी जाती थी।
  •  (i)अरबी और फारसी भाषाओं का साहित्य  एवं व्याकरण ।
  • (ii) कृषि , गणित , भूगोल ,कानून  ,ज्योतिष ,अर्थशास्त्र  ,नीतिशास्त्र  ,दर्शनशास्त्र।
तथापि उपयुक्त सब विषयों की शिक्षा सब मदरसों में ना दी जाकर प्रत्येक मदरसे में साधारण दो विषयों की शिक्षा दी जाती थी, जैसे

  • (i) दिल्ली के मदरसे में कविता और संगीत की शिक्षा दी जाती थी ।
  • (ii) स्यालकोट के मदरसे में गणित और ज्योतिष की शिक्षा दी जाती थी।
  • (iii)  रामपुर के मदरसे में ज्योतिष और अर्थशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी।

 (3) शिक्षण की विधि

  • (i) मदरसों में मौखिक शिक्षण विधि थी।
  • (ii) छात्रों को शिक्षा देने के लिए अध्यापकों के द्वारा भाषण विधि प्रयुक्त होती थी।
  • (iii) कक्षा नायकीय पद्धति का पर्याप्त प्रचलन था।
  • (iv) धर्म ,दर्शन , तर्कशास्त्र और राजनीति शास्त्र के शिक्षण में तर्क विधि मुख्य थी।
  • (v) संगीत हस्तकला चित्रकला और चिकित्सा शास्त्र आदि विषयों की शिक्षा में व्यवहारिक कार्य की व्यवस्था थी।
  • (vi) छात्रों को स्वाध्याय के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।

(4) शिक्षा के माध्यम


राज्य की भाषा फारसी थी। इस भाषा का ज्ञान प्राप्त करके ही मनुष्य को राज्य पद प्राप्त हो सकते थे। फारसी को शिक्षा के माध्यम के पद पर प्रतिष्ठित किया गया था।

  • गन्नार मिर्डल के अनुसार, "उच्च स्तर पर शिक्षा का माध्यम फारसी भाषा थी।"

(5) परीक्षाएं


मुस्लिम योग में छात्रों की परीक्षा की कोई निश्चित प्रणाली नहीं थी।शिक्षक प्रत्येक छात्र के ज्ञान के ज्ञान का स्वयं मूल्यांकन करके उसे उच्च कक्षा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्रदान कर देता था।

(6) उपाधियां


प्राय: शिक्षा समाप्त करने वाले छात्रों को प्रमाण पत्र या उपाधियां नहीं दी जाती थी।किंतु जो छात्र अपने अध्ययन के विषय में असाधारण योग्यता का प्रमाण दिया करते थे।उनको उपाधियों से विभूषित किया जाता था।

उदाहरणार्थ
  • (i) साहित्य के छात्रों को काबिल की उपाधि प्राप्त होती थी।
  • (ii) धर्मशास्त्र के छात्रों को आलिम की उपाधि प्राप्त होती थी।
  • (iii) तर्कशास्त्र और दर्शनशास्त्र के छात्रों को फाजिल की उपाधि प्राप्त होती थी।
छात्रों को उपाधियों प्रदान करने के समय नियमित रूप से समारोह का आयोजन किया जाता था।


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